सम्पूर्ण ईश्वरीय सृष्टि में
जीव ही श्रेष्ठ है। उसमें मनुष्य का जीवन ही ऐसा है जिसे जन्म से मृत्यु तक की
समस्त गतिविधियों में विभिन्न प्रकार के सहयोग की अपेक्षा होती है। प्रारंभ के चार-पांच वर्षों तक अभिभावक समेत घर के वातावरण में मौजूद सभी वरिष्ठों से वह
अबोध नित नयी गतिविधियां सीखता है। उम्र के विभिन्न पड़ावों पर समयानुरूप जो भी
व्यक्ति उसको सीखने समझने जैसी गतिविधियों में सहयोग करता है वही उसका तात्कालिक
शिक्षक या आचार्य अथवा गुरु होता है। आचार्य के महत्व को बताते हुए तैत्तिरीय उपनिषद
में कहा गया है "आचार्य देवो भव"। यह भारतीय संस्कृति की
उत्कृष्टता है कि यहां माता-पिता के साथ आचार्य को भी देवता के समान सम्मान दिया
जाता है। आचार्य अर्थ है शिक्षक। वह शिक्षक स्वयं के व्यक्तित्व के कारण ही पूरी
दुनिया में माता-पिता के साथ सबसे बड़ा सम्मान पाता है।
आचार्य या शिक्षक शब्द सुनते
ही हमारे मन में प्रश्न उठता है - यह शिक्षक कौन हैं? क्या ये वही लोग हैं जो किसी विद्यालय के भवन में बने कक्षों में एक
निश्चित पाठ्यक्रम को पढ़ाते हैं? तो वर्तमान में प्रचलित
शिक्षा पद्धति के अनुसार समाधान के रूप में हम कह सकते हैं कि हाँ, यह ठीक है। हमारी यह सामान्य सोच बन चुकी है कि जो हमें पूर्व में
निर्धारित पाठयक्रम पढ़ाता है, वही क्रमिक रूप से हमारा शिक्षक होता है। किन्तु
सत्य इससे कहीं अलग है। शिक्षक न केवल पुस्तकीय ज्ञान देता है बल्कि उसके साथ-साथ अनुशासन
की सीख, चरित्र, नैतिकता जैसे मूल्यों
की प्राण प्रतिष्ठा कर एक अनुशासित नागरिक का निर्माण भी शैक्षणिक सिद्धांतों के
अनुरूप जीवन का निर्माण करता है। इसीलिए कहा जाता है कि यदि बालक का मन मिट्टी की
तरह है जिसे किसी भी रूप में ढाला जा सकता है, तो शिक्षक एक
कुम्हार की भूमिका ग्रहण करता है, जो बालक के
व्यक्तित्व को आकार देता है। यदि बच्चे का चरित्र एक इमारत की तरह है तो शिक्षक
बच्चे के चरित्र की मजबूत नींव रखता है। यदि किसी बच्चे का ज्ञान प्रकाश के समान है
तो शिक्षक एक मोमबत्ती की भूमिका निभाता है जो उसे प्रकाश प्रदान करता है। इसीलिए
आचार्य के बारे में कहा है – “धर्मज्ञो धर्मकर्त्ता च सदा धर्मपरायण:।
तत्त्वेभ्य: सर्व शास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते”।। शिक्षक के बारे में एलेक्जेंडर ने कहा है –“जीने
के लिए अपने पिता का शुक्रगुजार हूँ, पर अच्छे से जीने के
लिए अपने शिक्षक का” इसके माध्यम से हम शिक्षक की भूमिका को महसूस कर सकते हैं। इतिहास
साक्षी है कि जिस राज्य के गुरुकुल श्रेष्ठ शिक्षकों से सुसज्जित रहे उनकी
यश-कीर्ति आज भी गाई जाती है। यह स्पष्ट है कि शिक्षक भूमिका कितनी अहम थी,
है और रहेगी। यह श्रेष्ठ सभ्यताओं से समझा जा सकता है। आज भी
शिक्षकों का व्यक्तित्व इतना आकर्षक और अनुकरणीय होना चाहिए कि जिससे पूरा समाज
लाभान्वित हो। एक शिक्षक अपनी विद्वता से ही समाज में पहचान बनाता है, इसीलिए कहा
गया है –“आचार्यस्त्वस्य यां जातिं विधिवद्वेदपारगः । उत्पादयति
सावित्र्या सा सत्या साजरामरा ।। समाज में यह भी प्रचलित हैं – “हर किसी की सफलता में एक शिक्षक की अहम
भूमिका अवश्य होती हैं।“
शिक्षक द्वारा प्राप्त ज्ञान ही शिक्षा शब्द से व्यवहृत होता है। नेल्सन
मंडेला के शब्दों में शिक्षा- “दुनिया
बदलने के लिए शिक्षा सबसे मजबूत हथियार है”। पुरातनकाल से ही शिक्षा हर सभ्यता का
जरूरी हिस्सा रही है। समय और बदलते जमाने के साथ शिक्षा का स्वरूप भी बदला है।
शिक्षा की एक ऐसी ही प्राचीन प्रणाली जो दुनिया के पूर्वी हिस्से से शुरू हुई और
आज भी प्रेरणा का कारण बनी हुई है वो है
गुरुकुल शिक्षा प्रणाली।
शिक्षा की महत्ता और गरिमा, उपयोगिता
और आवश्यकता की जरूरत अनादिकाल से अब तक मनीषियों ने बताई है। यही हेतू है कि “विद्ययाऽमृतमश्नुते”
विद्या से अमृत प्राप्त होने जैसे सूत्रों का प्रादुर्भाव हुआ। इसीलिए विद्यादान
को किसी भी दान से श्रेष्ठ माना गया और इसको देने वाले शिक्षकों के लिए कहा गया कि
‘आचार्यदेवो भव’ अर्थात् जो तुम्हारा शिक्षण करता है उसे उसे देवता मानकर सम्मान
दो। इसके लिए जरूरी है कि अध्यापक और विद्यार्थी के बीच सौहार्द्र, समीपता व सम्मान का भाव हो, जो
आज नहीं दिखाई नहीं पड़ता और यही कारण है कि आज का विद्यार्थी डिग्री, डिप्लोमा तो ले लेता है, लेकिन व्यवहारिक जीवन का शिक्षण, चरित्र, ज्ञान
व उत्कृष्ट व्यक्तित्व का उसमें अभाव बना रहता है। जिसका असर तब दिखता है जब
व्यक्ति सामाजिक जीवन में सहजता से स्वयं को समायोजित नहीं कर पाता। इसलिए मूल्यों
के बगैर शिक्षा न सिर्फ अधूरी है, बल्कि
अनुपयोगी भी है। ऐसी शिक्षा जो जीवन को प्रकाशित न करे, उसे समुन्नत न बनाए वह विद्या किस काम की।
शिक्षा का क्षेत्र केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं अपितु व्यक्तित्व विकास से भी जुड़ा
है। अच्छी शिक्षा और संस्कारों से जीवन में आत्मविश्वास, सफलता और दृढ़ इच्छा शक्ति का विकास होता है। इनके
लिए परिवार संसार का
सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है। सबसे बड़ा चिकित्सालय है। सबसे बड़ी प्रशिक्षणशाला है।
सबसे बड़ा साधना केन्द्र भी है। परिवार में प्रशिक्षित व्यक्ति ही उदारचरित बनता
है। अपने पराये का भेद भूल जाता है। उसके लिए सम्पूर्ण वसुधा एक कुटुम्ब की तरह से
हो जाती
है- “अयं निजः परोवेति, गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटम्बकम्।।“
(मनुस्मृति)
सामान्य जीवन में शिक्षा प्रदाता होने से प्रकृति भी एक शिक्षक है -
प्रकृति में स्थित हर वस्तु को देखकर हम सीखते हैं, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव,। जैसे- हमने मछली से तैरना, पक्षियों से उड़ना, बंदरों से कूदना सीखा।
माता, पिता और आचार्य को देव समझने वाली इस
भव्य भारतीय संस्कृति का जितना गुणानुवाद गाया जाये, उतना कम ही है। परन्तु इस कराल काल में जहॉं भौतिकवाद के प्रवाह में
व्यक्तिवादी, भोगवादी तथा स्वार्थपरायणता का ताण्डव
नृत्य हो रहा है, वहाँ मानव जीवन में इन दिव्य और उदात्त
विचारों के लिये स्थान ही कहाँ है?
कदाचित् कुछ संस्कारी परिवार अपने बालकों में "मातृदेवो भव!
पितृदेवो भव! आचार्यदेवो भव!' के विचारों
का सिंचन करते भी होंगे। परन्तु आधुनिक समाज के विचारवान और तथाकथित पाश्चात्य
विचारों से अभिसिंचित शिक्षित वर्ग इस उहापोह में हैं कि इन विचारों को सामाजिक
प्राधान्य दिया जाये या नहीं ? इन
बुद्धिवादी लोगों के बधिर कर्णों में माता-पिता के वात्सल्य की आतुर ध्वनि कहाँ से
और कैसे पहुंचे? इसी प्रकार भोग-जीवन को ही सर्वस्व
समझने वाले पशुतुल्य भोगवादी लोगों में माता-पिता एवं आचार्य के
स्नेह की अनुभूति लेने
की शक्ति न के बराबर है? मैं कल्पना कर सकता हूँ कि नकारात्मकता
के विरोधी तत्वों के विषाणुओं का उच्च प्रभाव पूरे समाज में फैल गया है और
माता-पिता के दिमाग को भी प्रदूषित कर रहा है जो अपने बच्चों को शिक्षकों का
सम्मान करना सिखाने में विफल रहते हैं। फिर से, शिक्षा
प्रणाली को परिवर्तन से गुजरना होगा और छात्रों को सही शिक्षा प्रदान करनी होगी और
छात्र और शिक्षक समुदायों की रक्षा करनी होगी।
परंतु इतने व्यापक महत्व के विषय पर जहाँ दुर्भाग्यवश
समाज और सरकारों के रवैये और नित हो रही उपेक्षा से शिक्षकों, अध्यापन व्यवस्था और उनकी कार्यदशाओं में बहुत
न्यूनता आई है।
वहीं अध्यापक भी शिक्षा दान के दायित्व न तो समझ रहे हैं, न ही अनुभव कर पा रहे हैं। उनकी दृष्टि में
अध्यापक का वैसा ही कार्य है जैसा कि किसी लिपिक या कार्यालय में कार्यरत कर्मचारी
का विद्यालयों स्कूलों में घंटों में अपनी कार्यावधि पूरी कर देने, पुस्तक पढ़कर सुना देने अथवा उसकी व्याख्या कर
देने भर को ही अध्यापक अपना काम समझते हैं। इसलिए अब शिक्षण का कार्य दायित्व न रह
कर व्यवसाय बन चुका है और व्यवसाय संवेदना से परे होता है। इसलिए संवेदनहीन हो
चुकी शिक्षा व्यवस्था से कैसे आपेक्षा की जा सकती है कि वह राष्ट्र के लिए नैतिक
और निष्ठा से परिपूर्ण युवाओं की श्रृंखला तैयार कर सकेंगे।
सरकारों तथा संस्थाओं को शिक्षकों की दयनीय स्थिति और इस ओर किए
जा रहे प्रयासों को नष्ट करके उनके मूल दायित्वों के निर्वहन में आ रही बाधाओं का विकल्प खड़ा करना
होगा। ताकि वे सिर्फ शैक्षणिक कार्यों से सम्बद्ध रहें। साथ ही वे अपने दायित्वबोध
को समझें। दूसरी ओर इसमें महत्वपूर्ण जबाबदारी विद्यार्थियों की भी है कि वे अपने
शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का भाव रखें। क्योंकि पंचतंत्र में भी कहा
गया है – “विद्यां ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वात्
धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥”
विद्या विनय से आती है और विनय से पात्रता और फिर पात्र व्यक्ति ही परिवार, समाज और राष्ट्र सेवा में दक्षता से समर्पित हो
सकता है।
शिक्षकों के गुणों का वर्ण
करते हुए कहते हैं “विद्वत्त्वं दक्षता शीलं सङ्कान्तिरनुशीलनम्। शिक्षकस्य
गुणाः सप्त सचेतस्त्वं प्रसन्नता”।।
संसार में सदैव
विचारशील, परामर्शशील, आचारणनिष्ठ, निर्मल
बुद्धि वाले किसी धर्मनिष्ठ आचार्य से परामर्श लेना चाहिए, जिसने लोक-व्यवहार और
धर्माचरण को अपने जीवन में उतार लिया, वही मोह और भय से मुक्त होकर उचित
परामर्श देता है।
सच्ची शिक्षा आत्मज्ञान और मुक्ति है। जब तक आचार्य सीखने की अपनी
शाखा के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पहलुओं से अच्छी तरह से सुसज्जित नहीं होते हैं, तब तक उत्सुकता से प्रतीक्षा करने वाले दिमागों
का मार्गदर्शन करना मुश्किल होता है। ऐसा होने के लिए देश को शिक्षा को प्राथमिकता
देनी होगी, समाज को शिक्षकों का सम्मान करना होगा और शिक्षकों को भी अपना
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होगा। राष्ट्र का सच्चा और वास्तविक निर्माता अध्यापक
ही है क्योंकि वह अपने विद्यार्थियों को शिक्षित और विद्वान् बनाकर ज्ञान की एक
ऐसी अखंड ज्योति जला देता है जो देश और समाज के अन्धकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश
फैलाती है। प्रत्येक देश के विद्यार्थी उस देश के भावी निर्माता होते हैं। उनका
नैतिक, मानसिक और सामाजिक विकास अध्यापक पर ही
निर्भर करता है।
“सच्ची शिक्षा आत्मज्ञान और मुक्ति है”, समग्र शिक्षा प्रणाली ही समग्र व्यक्ति तैयार कर सकती है। समाज को ज्ञान का लाभ उठाने के लिए, उसे अपनी शैक्षिक प्रणाली को प्रमुख बनाना होगा। न्यून मानसिकता से सशक्त मानसिकता की ओर बढ़ना होगा। हीनता से प्रेरित पाठ्यचर्या निपुणता को एक स्वाभिमानी, जोश से प्रेरित, स्थानीय रूप से प्रासंगिक विचारों से प्रेरित शिक्षा प्रणाली की ओर बढ़ना चाहिए। नई शिक्षा नीति के साथ-साथ आचार्य को ऐसा होना चाहिए, जिसे पारिस्थितिकी तंत्र के समन्वय में महारत हासिल हो और जो शैक्षणिक गतिविधियों को अपने शिक्षण से सम्मिलित करे। शिष्यों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए आचार्य को ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के साथ मार्गदर्शन देना होता है। जब तक आचार्य सीखने की अपनी शाखा के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पहलुओं से अच्छी तरह से सुसज्जित नहीं होते हैं, तब तक उत्सुकता से प्रतीक्षा करने वाले दिमागों का मार्गदर्शन करना मुश्किल होता है। ऐसा होने के लिए देश को शिक्षा को प्राथमिकता देनी होगी, समाज को शिक्षकों का सम्मान करना होगा और शिक्षकों को भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होगा। मनुष्य को गुणवान बनाने के लिए शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि “ज्ञानेन हिन पशुभि: समाना” ज्ञान से हीन मनुष्य पशु के सामान होता है। मनुष्य के कार्य और व्यवहार में सुन्दरता और शिष्टता शिक्षा के द्वारा ही आती है। शिक्षा जगत में शिक्षक का एक गौरवपूर्ण स्थान है। बच्चों की शिक्षा का पूर्ण दायित्व शिक्षक पर ही निर्भर करता है। समाज और देश के निर्माण में शिक्षक का महान योगदान होता है। एक शिक्षक ही देश के लिए योग्य नागरिक का निर्माण करके देश के भविष्य को बनाता है। अध्यापक का महत्व सर्वविदित है। अतः शिक्षक को समाज में गौरवपूर्ण और सम्मानपूर्ण स्थान मिलना चाहिए।
सूर्यकांत शर्मा